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Friday, February 20, 2015

geet khushi ke गीत ख़ुशी के


जो गीत कभी तुम गाते थे 
वो गीत ख़ुशी के गाउँ मैं
थोड़ा तुम मुझको समझो प्रिय 
थोड़ा खुदको तुम्हें समझाऊँ मैं 

किसके प्रेम का भार है कितना
प्रेम को तराजू में क्यूँ तौले
सच्चे प्रेम का अर्थ दो दिलो का मिलना है
आज अब हम भी एक-दूजे के हो ले
कभी गढ़ों तुम प्रेम की भाषा 
कभी मुखरित हो जाऊँ मैं 

जो गीत कभी तुम गाते थे 
वो गीत ख़ुशी के गाउँ मैं....

ना अहम ना छल - कपट हो
ना ही हो अविश्वास जरा सा 
प्रेम भावना हो सच्ची दोनों के मन में
कोई ना थोड़े किसी की आशा 
प्रेम पंछी बन संग तुम्हें ले 
नील गगन में उड़ जाऊँ मैं

जो गीत कभी तुम गाते थे 
वो गीत ख़ुशी के गाउँ मैं....


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18 comments:

  1. बहुत सुंदर गीत

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    1. धन्यवाद नीरज जी

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    2. रीना जी , आप ने बहुत ही सुंदर रचना लिखी है । यदि आप चाहे तो शब्दनगरी www.shabdanagari.in पर भी अपनी उत्तम रचनाए प्रकाशित कर सकती है ताकि हम इन्हे आपके नाम से लोकप्रिय रचनाओ मे सम्मिलित कर सके । हमे शब्दनगरी पर आपकी उत्तम रचनाओ का इंतज़ार रहेगा ।
      प्रियंका शर्मा - शब्दनगरी संगठन

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  2. Replies
    1. धन्यवाद राजीव जी

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  3. बहुत सटीक और भावपूर्ण अभिव्यक्ति...बहुत सुन्दर

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    1. धन्यवाद कैलाश जी

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  4. वाह!! बहुत सुंदर गीत सुंदर भाव से सजा हुआ...बधाई...

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    1. धन्यवाद हिमकर जी

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  5. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (22-02-2015) को "अधर में अटका " (चर्चा अंक-1897) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. प्रेम की सुन्दर अभिव्यक्ति ... लाजवाब गीत ...

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    1. धन्यवाद दिगंबर नासवा जी

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  7. गीत भी सुन्दर, तस्वीर भी सुन्दर.

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    1. धन्यवाद राहुल जी

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  8. जितने सुंदर गीत उतने सुंदर भाव।

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  9. होली के आगमन पर आह्ह्ह एक से बढ़्कर एक हैं मन को छोटी बहुत खूबसूरत रचना....बधाई स्वीकारें !

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