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Saturday, July 18, 2015

paritykta परित्यक्ता



घूरती है उसे हजारों की निगाहें
हर निगाह में दोषी वो ही 
हर निगाह तैयार है 
बाण बनकर
हजारों सवालों के तीर
छोड़ने को तैयार
क्यूँकर हुआ ऐसा
क्या किया उसने
कुछ तो खोट 
उसमे ही होगी
तभी तो हो गयी वो
" परित्यक्ता "
हाँ वो परित्यक्ता है
क्यूंकि नहीं सह पाई वो
प्रताड़ना, उलाहना
उस बेशरम शराबी की
जिसे लोगो ने उसका 
पति परमेश्वर बना दिया था
हाँ वो छोड़ी गई है 
या खुद छोड़ आई है 
उस नर्क को 
क्या फर्क पड़ता है इससे..
बात तो सिर्फ इतनी है 
की वो अब  "परित्यक्ता" है...

7 comments:

  1. बहुत सुंदर.... प्रकाशन की हार्दिक बधाई रीना जी

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  2. कमालहैं...... बेहद सुंदर

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  3. दिनांक 20/07/2015 को आप की इस रचना का लिंक होगा...
    पुकारा तो ज़रूर होगा[मेरी पहली चर्चा] पर...
    आप भी आयेगा....

    ReplyDelete
  4. कोई बुराई नहीं है छोड़ आने में ... ऐसे में यही सही कदम है ...
    जिंदगी से प्यार होना जरूरी है इसे जीना चाहिए ... खुश रह कर ...

    ReplyDelete
  5. बहुत सुंदर.... प्रकाशन की हार्दिक बधाई रीना जी

    राज कुमार
    आपका मेरे ब्लॉग पर इंतजार है.
    अज्ञेय जी की रचना... मैं सन्नाटा बुनता हूँ :)
    http://rajkumarchuhan.blogspot.in

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