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Thursday, October 29, 2015

vaishya वैश्या



वो जन्म से वैश्या नहीं ना किया है उसने कोई पाप घरवालों के भविष्य की खातिर झेल रही संताप बाबा उसका एकदम शराबी माँ के ह्रदय में है खराबी छोटे छोटे भाई - बहनों की खातिर उसने घुँघरी पहने अपनी अस्मत हर रात गंवाती फिर भी दिनभर मुस्काती उस बेटी के हिम्मत के क्या कहने दिन में माँ - बाबा की बिटिया है भाई- बहनों की दीदी रात में बन जाती है वो लाली और सुरीली जीवन उसका जैसे अभिशाप नहीं बचा पाई वो बिटिया खुद को करने से ये पाप फिर भी आस है उसके मन में की एकदिन उसके भाई- बहन समझेंगे उसके त्याग,पीड़ा और जज्बात और दिलाएंगे उसको इस दलदल से निजात जीती है लेकर बस यही आस और बेचती है अपना जिस्म हर रात।


Saturday, October 24, 2015

sanyukt pariwar संयुक्त परिवार


बात हो गई अब ये पुरानी
जब दादी सुनाती थी कहानी

दादा के संग बागों में खेलना
रोज सुबह शाम सैर पर जाना

भरा पूरा परिवार था प्यारा
दादा दादी थे घर का सहारा

बात हो गई अब ये पुरानी
संयुक्त परिवार की ख़त्म कहानी

दादी की कहानी ग़ुम है
दादा जी अब कमरे में बंद है

गुमसुम हो गई उनकी जवानी
बुढ़ापे ने छिनी उनकी रवानी

बच्चे अब नहीं उनको चाहते
बोझ जैसा अब उन्हें मानते

रोज गरियाते झिझकाते है
बूढ़े माँ पिता को सताते है

एक समय की बात ख़त्म हुई
दूजे समय ने की मनमानी।

बात हो गई अब ये पुरानी
संयुक्त परिवार की ख़त्म कहानी
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