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Thursday, October 29, 2015

vaishya वैश्या



वो जन्म से वैश्या नहीं ना किया है उसने कोई पाप घरवालों के भविष्य की खातिर झेल रही संताप बाबा उसका एकदम शराबी माँ के ह्रदय में है खराबी छोटे छोटे भाई - बहनों की खातिर उसने घुँघरी पहने अपनी अस्मत हर रात गंवाती फिर भी दिनभर मुस्काती उस बेटी के हिम्मत के क्या कहने दिन में माँ - बाबा की बिटिया है भाई- बहनों की दीदी रात में बन जाती है वो लाली और सुरीली जीवन उसका जैसे अभिशाप नहीं बचा पाई वो बिटिया खुद को करने से ये पाप फिर भी आस है उसके मन में की एकदिन उसके भाई- बहन समझेंगे उसके त्याग,पीड़ा और जज्बात और दिलाएंगे उसको इस दलदल से निजात जीती है लेकर बस यही आस और बेचती है अपना जिस्म हर रात।


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