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Thursday, October 29, 2015

vaishya वैश्या



वो जन्म से वैश्या नहीं ना किया है उसने कोई पाप घरवालों के भविष्य की खातिर झेल रही संताप बाबा उसका एकदम शराबी माँ के ह्रदय में है खराबी छोटे छोटे भाई - बहनों की खातिर उसने घुँघरी पहने अपनी अस्मत हर रात गंवाती फिर भी दिनभर मुस्काती उस बेटी के हिम्मत के क्या कहने दिन में माँ - बाबा की बिटिया है भाई- बहनों की दीदी रात में बन जाती है वो लाली और सुरीली जीवन उसका जैसे अभिशाप नहीं बचा पाई वो बिटिया खुद को करने से ये पाप फिर भी आस है उसके मन में की एकदिन उसके भाई- बहन समझेंगे उसके त्याग,पीड़ा और जज्बात और दिलाएंगे उसको इस दलदल से निजात जीती है लेकर बस यही आस और बेचती है अपना जिस्म हर रात।


10 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (31-10-2015) को "चाँद का तिलिस्म" (चर्चा अंक-2146) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    Replies
    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका :-)

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  2. बहुत ख़ूब, मर्मस्पर्शी

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  3. उम्दा प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई. 

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  4. बेहद खूबसूरत और मार्मिक रचना....
    आप को दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@आओ देखें मुहब्बत का सपना(एक प्यार भरा नगमा)

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  5. ...बहुत सुन्दर प्रस्तुति के साथ शाश्वत सत्य

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  6. Looking to publish Online Books, in Ebook and paperback version, publish book with best
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  7. भावपूर्ण रचना..

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