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रविवार, 1 सितंबर 2013

Kankrit ke jangal कंकरीट के जंगल



कभी इन्हीं जगहों पर हुआ करते थे
बड़े- बड़े जड़ -लताओंवाले वृक्ष 
सुगन्धित फूलों के पौधे
हरियाली फैलाती दूर तक बिछी घास 
तरह -तरह के पंछी और उनकी मीठी आवाज.....
अपने अन्दर कई खूबसूरती और
 रहस्य को छुपाये ये जंगल .......
और इसके पास छोटे छोटे 
घरों में रहनेवाले सामान्य लोग
जो सारा दिन काम करने के बाद 
इन वृक्षों के निचे बैठ कुछ पल को 
ठंडी साँस लेते थे.......
परन्तु बदलते परिवेश और आधुनिकता ने चारों ओर
कंकरीट के जंगल बना दिए है
अब तो चारों ओर केवल कंकरीट
 की इमारतों का ही कब्ज़ा है ......
इन इमारतों की खूबसूरती में बिकते लोग
कोई बनाने की चाहत में बिक रहा है
मानवीयता बेच के संवेदनहीन हो रहा है ......
तो कोई खरीदने की चाह में 
खुद को बेंच रहा है.........
और इस खूबसूरती में रहनेवालों की ठाठ ही अलग है
बंद खिड़की और दरवाजों के अन्दर चाहे जो है......
पर बहार निकलते ही ये बन जाते है
बड़े साहब और मेम साहेब
और पहन लेते है आधुनिकता के 
काले कोट बड़े साहेब जी
और डिजाइनर साड़ी में मेम साहेब जी.....
एकदम खानदानी .....
बहुत ही सुन्दर है ये कंकरीट के जंगल....
और इसके लोग....




28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार -02/09/2013 को
    मैंने तो अपनी भाषा को प्यार किया है - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः11 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra




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  2. maarmik रचना |आधुनिक परिवेश में सटीक |

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज सोमवार (02-09-2013) को  प्रभु से गुज़ारिश : चर्चामंच 1356 में  "मयंक का कोना"   पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. अब उसी में जान फुका जाय। ……. सुन्दर

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  5. बिलकुल सही कहा आपने


    बंद खिड़की और दरवाजों के अन्दर चाहे जो है......
    पर बहार निकलते ही ये बन जाते है
    बड़े साहब और मेम साहेब
    और पहन लेते है आधुनिकता के
    काले कोट बड़े साहेब जी
    और डिजाइनर साड़ी में मेम साहेब जी.....
    एकदम खानदानी .....
    बहुत ही सुन्दर है ये कंकरीट के जंगल....
    और इसके लोग..

    जवाब देंहटाएं
  6. बढते कंक्रीट के जंगल ही आज के कथित विकास के धोतक हैं !!

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  7. कंकरीट के जंगल,बहुत सुन्दर-सटीक प्रस्तुति.

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  8. शहरीकरण और शहर के लोगों पर सटीक रचना

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  9. बढ़िया प्रस्तुति-
    आभार आपका-

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  10. इन जंगलों में रहने वालों की आत्मा कितनी छोटी होती है ये कोई नहीं जानता ...
    इनका विस्तार बस चारदीवारी तक रहता है ...

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  11. नमस्कार आपकी यह रचना कल मंगलवार (03-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  12. एकदम खानदानी .....
    बहुत ही सुन्दर है ये कंकरीट के जंगल....
    और इसके लोग........सुन्दर चित्रण शहरीकरण पर सटीक रचना !!

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  13. बहुत ही सुंदर सटीक प्रस्तुति,,,.

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  14. अब तो चारों ओर केवल कंकरीट
    की इमारतों का ही कब्ज़ा है ......
    सच है

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  15. आधुनिक परिवेश का सटीक चित्रण …. सुन्दर अभिव्यक्ति

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  16. बहुत तीखा कटाक्ष किया है इस कविता के ज़रिये आपने।।

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