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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

sadak सड़क


सफेदपोश पर दाग और सडकों पर गढ्ढे 
अच्छे नहीं लगतें .....
पर हुआ यही था सफ़ेद वस्त्रधारी 
आएं थे हमारे घर में और थमा गए वादों की 
एक लंबी फेहरिश्त सड़क ठीक , पानी सही
मँहगाई कम और ना जाने क्या
क्या- क्या - क्या 
उनके लड्डुओं में मिठास बहुत थी
इसलिए जीता भी दिए गए...
पर सड़क आज भी जस की तस .....
सर्दियों और गर्मियों में ओढा देतें हैं 
ये सडकों पर नकाब 
पर बारिश की पहली ही बूंदों के साथ 
धूल जातें हैं सारे वादें
और भर जाता हैं उन गढ्ढों में पानी
कुछ समझदार लोगों ने
अपने घर और आसपास के 
सडकों की मरम्मत करवा ली है 
ताकि उनके घर आनेवाले मेहमानों के 
सामने उनकी नाक ना कटे
सफदपोशों का क्या.... 
उनके पास तो केवल जीभ ही होती है
जो वोट माँगते वक्त लपालप चलती है
नाक तो होती नहीं...
जो कट जाने का डर हो ....
कुछ दुकानदारों ने 
बेसिर- पैर के वादों का इंतजार ना करते हुवे 
अपने और ग्राहकों की सुविधा को देखते हुवे 
आसपास की सड़कें दुरुस्त करवा ली
इस तरह से कुछ सड़कों को राहत मिली 
पर बची हुई वो बहुत सारी सड़कें 
जिनपर ट्रैफिक जाम भरा पड़ा है
और उसमे फँसे लोग 
गढ्ढों में गिरनेवाले लोग 
अब भी आपको पुकार रहें हैं...
क्योंकि आम जनता ने 
अपने-अपने बजट से अपनी-अपनी सड़क 
तो ठीक कर ली है...
बस अब आपकी बारी का इन्तजार है.. 
बजट तो आपके पास भी हैं ना ????? 

बुधवार, 21 सितंबर 2016

Tiranga desh ki shan hai तिरंगा देश की शान है


गर्व है अभिमान है
तिरंगा देश की शान है
रंग इसका और चमके
पूरे विश्व में ये दमके 
इसके लिए जीना हमें
इसके लिए मर जायेंगे
मादरे वतन की शान में
हम शीश सदा झुकायेंगे
नमन उन सपूतों को 
जो मिट गए पर ना झुके
नमन उन शहीदों को
जो देश की खातिर मिटे
मैं नाम उनका अपने ह्रदय में
स्वर्णिम अक्षरों से लिखती हूँ
फिर हाथ धर अपने ह्रदय पर 
मैं फिर-फिर उनको 
जीवित करती हूँ
जीवित करती हूँ 
उस खून की जवानी को
उनकी जिंदादिली और रवानी को 
यादे संजोये ह्रदय में अपने
मन में लिए नव उमंग और सपने
हमें देश का मान बढ़ाना है 
कदम से कदम मिलाना है 

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

vaishya वैश्या



वो जन्म से वैश्या नहीं ना किया है उसने कोई पाप घरवालों के भविष्य की खातिर झेल रही संताप बाबा उसका एकदम शराबी माँ के ह्रदय में है खराबी छोटे छोटे भाई - बहनों की खातिर उसने घुँघरी पहने अपनी अस्मत हर रात गंवाती फिर भी दिनभर मुस्काती उस बेटी के हिम्मत के क्या कहने दिन में माँ - बाबा की बिटिया है भाई- बहनों की दीदी रात में बन जाती है वो लाली और सुरीली जीवन उसका जैसे अभिशाप नहीं बचा पाई वो बिटिया खुद को करने से ये पाप फिर भी आस है उसके मन में की एकदिन उसके भाई- बहन समझेंगे उसके त्याग,पीड़ा और जज्बात और दिलाएंगे उसको इस दलदल से निजात जीती है लेकर बस यही आस और बेचती है अपना जिस्म हर रात।


शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

sanyukt pariwar संयुक्त परिवार


बात हो गई अब ये पुरानी
जब दादी सुनाती थी कहानी

दादा के संग बागों में खेलना
रोज सुबह शाम सैर पर जाना

भरा पूरा परिवार था प्यारा
दादा दादी थे घर का सहारा

बात हो गई अब ये पुरानी
संयुक्त परिवार की ख़त्म कहानी

दादी की कहानी ग़ुम है
दादा जी अब कमरे में बंद है

गुमसुम हो गई उनकी जवानी
बुढ़ापे ने छिनी उनकी रवानी

बच्चे अब नहीं उनको चाहते
बोझ जैसा अब उन्हें मानते

रोज गरियाते झिझकाते है
बूढ़े माँ पिता को सताते है

एक समय की बात ख़त्म हुई
दूजे समय ने की मनमानी।

बात हो गई अब ये पुरानी
संयुक्त परिवार की ख़त्म कहानी
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