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शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

sanyukt pariwar संयुक्त परिवार


बात हो गई अब ये पुरानी
जब दादी सुनाती थी कहानी

दादा के संग बागों में खेलना
रोज सुबह शाम सैर पर जाना

भरा पूरा परिवार था प्यारा
दादा दादी थे घर का सहारा

बात हो गई अब ये पुरानी
संयुक्त परिवार की ख़त्म कहानी

दादी की कहानी ग़ुम है
दादा जी अब कमरे में बंद है

गुमसुम हो गई उनकी जवानी
बुढ़ापे ने छिनी उनकी रवानी

बच्चे अब नहीं उनको चाहते
बोझ जैसा अब उन्हें मानते

रोज गरियाते झिझकाते है
बूढ़े माँ पिता को सताते है

एक समय की बात ख़त्म हुई
दूजे समय ने की मनमानी।

बात हो गई अब ये पुरानी
संयुक्त परिवार की ख़त्म कहानी

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

Pyari bitiya प्यारी बिटिया


बाबुल की सोन चिरैया 
अब बिदा हो चली
महकाएगी किसी और का आँगन
वो नाजुक सी कली
माँ की दुलारी
बिटिया वो प्यारी
आँसू लिए आँखों में
यादें लिए मन में
पिया घर चली
ओ भैय्या की बहना
ख्याल अपना रखना
मुरझा ना कभी जाना तू
ओ प्यारी सी कली
ले जा दुआएँ
और ढ़ेर सारा प्यार
बिटिया तेरे जीवन में आए
खुशियों की फुहार
पिया घर सजाना 
तू पत्नी धर्म निभाना
खुश रहना तू मेरी बिटिया
ना होना कभी उदास

*****************************

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

naari jivan नारी जीवन


सुबह पांच बजे उठकर 
झट फटाफट करती सारे काम
तो बनती है तुरंत झटपटाती कविता..
जब आफिस जाने के लिए बैठती बस में 
और लेती २ पल सुकून की सांसे 
तो बनता है सुकून का एक दोहा
बीती दोपहर जब घर लौटती
सुबह के अधूरे कामो में फिर से 
डट जाती, तो बनती है
फिर कोई छंदमुक्त अभिवक्ति
गरम रोटियों के सिकते ही
बनता है एक गरमागरम ग़ज़ल
पर हाँ रोटियों के जल जाने से भी
हो जाती है उदास गजल
मेज पर पड़ी वो डायरी
भी इंतजार कर सो जाती है
की, कब फुर्सत के पल पायेगी 
उसकी सहेली ,
और तब करेगी उससे दिन भर 
की सारी बातें,,
अपने बच्चे की किलकारी में
वो महसूस करती है 
सभी बच्चों के सुख और दुःख
फिर मन रचता है
एक ममतामयी रचना
रात में बिस्तर पर टेक लगा
कमर पर हाथ धर
जब भरती है आहे,,,
तो बनता है 
एक दर्दभरा गीत..
इस तरह एक नारी रचती है
अपना घर-संसार
अपने भाव अपनी रचना..
और रहती है सदा प्रसन्न 
क्यूंकि वो सागर है 
और सागर की भांति 
उसका ह्रदय है विशाल
जिसमे सबकुछ समाहित है..
और अपने प्रेम की लहरों से 
बस सबको भिगोती है 

शनिवार, 1 अगस्त 2015

tere sath तेरे साथ


तेरे साथ बिता वो पल, जब भी याद आता है 
ये मेरा मन पगला , सब कुछ भूल जाता है

हवाओं का फिजाओं का ये तुझसे कैसा नाता है
जब भी लेती हूँ मैं सांसे, मन महक जाता है

करू जतन कितना भी मैं,ना जाने क्या हो जाता है
मैं जब भी लिखती हूँ कुछ,पहले तेरा ही नाम आता है 

तेरे अहसास का वो पहला स्पर्श, जब भी याद आता है
हो जातीं हैं साँसे सुरमई, मन गुदगुदाता है

मैं जब भी सोचती हूँ तुझको, मन मुस्कुराता है
पर तुझे ही सोचना, मेरे दिल को लुभाता है 
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